यूपी की खुनी राजनीति
Rajneeti
अखिलेश यादव जी गीरे सवालों के घेरे में।
वीडियो देखें।
खूनी संघर्ष पर राजनीति के छींटे, निशाने पर अखिलेश सरकार3, 2016मथुरा में पुलिस और सत्याग्रहियों के खूनी खेल के बाद इस पर राजनीति के छीटें भी पड़ने लगे हैं
मथुरा में शहीद हुए SP और दरोगा को अखिलेशुद्दीन की सरकार रु 20-20 लाख का मुआवजा देगी।
याद करिए जब उ प्र में एक दरोगा जिया उल हक़ की हत्या हुई थी, तब उसके परिवार को अखिलेशुद्दीन ने क्या मुआवजा दिया था -
1. रु 45 लाख नगद
2. भाई को सरकारी नौकरी
3. जिया उल हक़ की बेगम को उ प्र पुलिस में DSP रैंक की नौकरी।
और अब फिर से याद करिए जब दादरी में अख़लाक़ मारा गया था तब क्या मुआवजा दिया गया था -
1. रु 90 लाख नगद
2. नॉएडा में फ्लैट
3. परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी।
मिंयाँ अखिलेशुद्दीन यह भेदभाव क्यों??? अरे कम से कम यह तो देख लेते की जिस यादव मुस्लिम गठजोड़ ने तुम्हें सत्ता दी, उस यादव समाज का ही एक बेटा कल मथुरा में शहीद हुआ है, क्या यदुवंशियों का खून मुल्लों से ज्यादा सस्ता है, या फिर उन्हें भी हिन्दू होने की सजा मिल रही है तुम्हारे राज में।
[04/06 23:05] +91 95553 87274: मैं मथुरा नगरी हूँ,घायल हूँ सत्ता की चोटों से,
कैसे कहूँ वेदना अपनी इन झुलसाये होठों से,
मैं तो प्रेम रंग में डूबी मदमस्तों की नगरी थी,
होली के रंगों में छायी प्रेम सुधा की बदरी थी,
वंशीवट पर बजी बांसुरी,मैं खुल कर इठलाई थी,
मैं कान्हा के बाल रूप पर मंद मंद मुस्काई थी,
मैं मीरा का प्रेम ग्रन्थ थी,सूर दास की स्याही थी,
वासुदेव की लीलाओं की पावन एक गवाही थी,
मैं यमुना के निर्मल तट पर ग्वालों के संग झूमी थी,
गोवर्धन से वृन्दावन तक कृष्णप्रेम मे घूमी थी,
लेकिन आज बहुत घायल हूँ,ह्रदय कष्ट में रोया है,
कांधों पर अपने मैंने चौबिस लाशों को ढोया है,
लुटी पिटी हूँ,पूछ रही हूँ लखनऊ के सरपंचो से,
मेरा सीना क्यों घायल है कट्टों और तमंचो से,
मोहन की मुरली को आखिर किसने चकनाचूर किया,
किसने दो सालों तक गुंडों को सहना मंजूर किया,
लगता है अपने ही कुत्ते पाल रहे थे नेता जी,
रामवृक्ष की जड़ में पानी डाल रहे थे नेता जी,
क्या कारण था,मथुरा की रखवाली नही करा पाये,
दो सालों से बाग़ जवाहर खाली नही करा पाये,
जिस में सारी खीर पकी है,बोलो बर्तन किसका था,
दो सालों तक इसके पीछे मौन समर्थन किसका था,
20 लाख में दो वर्दी वालों का मरण भुलाया है,
गौ भक्षी अख़लाक मरा तो,पूरा कोष लुटाया है,
ना तो ख़ान,हुसैन,अली,ना वोट बैंक के बिंदू थे,
जो कुर्बान हुए वर्दी वाले दोनों ही हिन्दू थे,
मुस्लिम होते तो सत्ता की अंतड़ियां तक फट जातीं,
चार फ़्लैट,रुपये करोड़,नौकरियां तक भी बंट जातीं,
अब बबलू पंडित कहे,वर्दी की यही कहानी है,
खुद नेता का हुक्म बजाएं,खुद देनी कुर्बानी है,
कब तक खेल चलेगा भईया,अब जवाब देना होगा,



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